जब रुपए के प्रतीक चिह्न के नमूने माँगे गए थे तब ये कहीं भी नहीं कहा गया था कि इसमें किसी विशेष लिपि का प्रयोग क्या जाए । जो नमूने अस्वीकृत किए गए वे लिपि के कारण तो अस्वीकृत नहीं किए गए ।
रुपए का वर्तमान प्रतीक देश की मुद्रा का प्रतिनिधित्व करता है । अतः एक तरह से यह अब राष्ट्रीय प्रतीक की तरह ही है । राष्ट्रीय प्रतीक केन्द्रीय स्तर पर निर्धारित होते हैं। भारतवर्ष का कोई राज्य कैसे खुद अपना प्रतीक चिह्न देश की मुद्रा को दे सकता है । संसद के दोनों सदनों को यह प्रकरण महामहिम राष्ट्रपति जी के सम्मुख रखना चाहिए ।
आज ये मुद्रा का प्रतीक बदल रहें हैं । कल अगर मुद्रा ही बदलने लगे तो ??? ध्वज बदलने लगे तो ??
उत्तर भारत में कभी भी किसी दक्षिण भारतीय भाषा या लिपि का विरोध देखने को नहीं मिलता । हम उत्तर भारतीयों को तो देश की सभी भाषाएँ अपनी ही लगती हैं । क्योंकि हम एक ही भारतवर्ष की सन्तान हैं । झूठे गढ़े गए किस्से अब नकारे जाने लगे हैं जिनमें कहा जाता था कि किसी बाहरी नस्ल ने आकर देश के आधे भाग पर कब्जा कर लिया था । कोई प्रमाण नहीं मिलते ऐसे किस्सों के । नवीनतम शोध कहते हैं कि हम भले गोरे हैं या काले, नाटे हों या लम्बे सभी के साझा पूर्वज हैं । भारतीय माँ बेटे, पिता पुत्र, बहन भाई तथा पति पत्नी सभी में जो आदर, सम्मान, रक्षण और स्नेह का भाव भारत के कोने कोने तक एक ही जैसा है फिर चाहे हमारी वेशभूषा और भाषा कैसी भी हो । ये भाव भारत की पुण्य भूमि से बाहर जाकर भिन्न होने लगते हैं ।
और फिर भाषाई भिन्नता कहाँ नहीं हैं ? एक ही प्रदेश के दो जनपद की भाषा भी हू ब हू कहाँ मिलती है । सहारनपुर की भाषा क्या चन्दौली या मिर्जापुर से ज्यों कि त्यों मिलती है ? नहीं ना । लेकिन हम सब हैं तो भारतीय ही।
कुछ लोग तो बस हर समय देश को खण्डित करने सपना देखते रहते हैं । एक सज्जन तो विदेश में कह कर आए हैं कि भारतवर्ष एक राष्ट्र नही है । ऐसे लोग देश की ज़ड़ों से जुड़े होते तो पता चलता कि भारतवर्ष तो लव कुश के समयकाल से ही एक राष्ट्र है, सम्राट युधिष्ठिर के समय भी था, सम्राट वीर विक्रमादित्य के समय में भी और सम्राट अशोक के समय में भी । यह सदा एक ही राष्ट्र रहेगा क्योंकि अभी भी इसमें वे लोग शेष है जिनके तन, मन, वचन और कर्मों में अपने पूर्वजों की सुगन्ध विद्यमान है ।
जय हिन्द