मध्यम गति से मेरी मोटरसाइकिल दौड़ी जा रही थी | .... और बस चन्द ही मिनटों में वो जगह आने वाली थी जहाँ में अक्सर रुककर चलता हूँ | दरअसल राजमार्ग पर यह जगह मुझे रुकने के लिए विवश कर ही देती है | यहाँ पर सड़क किनारे आम का एक बड़ा सा पेड़ है और उसी जगह से एक पतली सी सडक अन्दर किसी गाँव में जाती है | इस तिराहे पर आम के पेड़ के नीचे एक हैण्डपम्प लगा हुआ है | और पास ही कंक्रीट से बनी एक टूटी-फूटी बेंच है | अन्दर वाले गाँव से जब कोई एक्का-दुक्का यात्री शहर जाने वाली बस पकड़ने के लिए यहाँ आता है तो इसी बेंच पर आम के पेड़ की ठण्डी छाँव में बैठकर प्रतीक्षा करता है और सरकारी हैण्डपम्प से शीतल जल पीकर अपनी प्यास बुझाता है |
मुझे इन यात्रियों में कोई दिलचस्पी कभी नही रही | यहाँ रुककर चलने का एक बहाना तो यही है कि यहाँ पर लगे हैण्डपम्प का पानी बहुत ठण्डा और स्वादिष्ट है | ........ और दूसरा बहाना .... या यह कह लीजिये कि कारण यह है कि यहाँ पर हर समय कुछ चिड़ियाँ और गिलहरियाँ उछल-कूद करती रहती हैं | जिन्हें निहारना मुझे बहुत अच्छा लगता है | कभी-कभी तो मैंने यहाँ छोटे-छोटे खरगोश भी पानी पीने के लिए आते देखे हैं | ........... कितने मासूम से प्राणी हैं......... जब कोई मनुष्य यहाँ हैण्डपम्प चलाकर पानी पीता है, तो कुछ पानी बहकर आस-पास के छोटे-छोटे से गड्ढो में भर जाता है | ....... और जब कोई ताज़ा और ठण्डा पानी निकालने के लिए थोड़ी देर तक हैण्डपम्प चलाकर कुछ अधिक पानी निकाल देता है तो पानी बहकर आम के पेड़ तक पहुँच जाता है | इसलिए यह पेड़ आसपास के पेड़ों से अधिक तृप्त और हरा-भरा नज़र आता है |
कई महीने पहले एक दिन जब मैं यहाँ रुका था तब एक कार चालक ने भी यहाँ रुककर पानी पिया था | गाड़ी पर गेंदें के फूलों की बहुत सी मालाएँ लटकी हुई थी | शायद किसी समारोह में सम्मिलित हुयी हो या शायद किसी दुल्हन को छोड़कर आ रही हो | पानी पीकर जब चालक गाडी में बैठा तो एक बार पुनः बाहर निकला और कुछ मालाएँ तोड़कर वहीँ फेंक दी | शायद गाडी चलाते समय वो सामने देखने में बाधा पहुँचा रही थी | बाद में वहाँ गेंदें के कुछ पौधे उपजे और फिर उन पर सुन्दर पीले-पीले फूल खिलखिला उठे | कुछ रँग-बिरँगे जंगली फूल तो वहाँ पहले से ही खिले रहते हैं | ........ ऐसा तो नही है कि ये कोई ख़ूबसूरत पिकनिक स्पॉट है | लेकिन सडक किनारे की ये जगह कुछ पलों के लिए किसी को सुकून अवश्य दे सकती है |
वो जगह आ गयी .......... और मैंने मोटरसाइकिल किनारे लगाकर बन्द करके खड़ी कर दी | लेकिन आज का दृश्य देखकर तो मैं स्तब्ध रह गया | हैण्डपम्प के पास जल पुनर्भरण प्रणाली का निर्माण किया गया था | मोटरसाइकिल से उतरने के बाद हैण्डपम्प चलाकर मैंने हाथ धोये | जैसे ही हाथों से होकर पानी नीचे गिरा तो एक-एक बूँद वाटर रिचार्ज वाले गड्ढे में समा गयी | गड्ढा ऊपर से भी पूरी तरह ढका हुआ था | आज ये जगह पूरी तरह उजाड़ लग रही थी | पहले यहाँ शान्ति हुआ करती थी ................ आज यहाँ वीराना था | गेंदें के पौधे तो सूख ही चुके थे, जंगली फूल भी अपने अस्तित्व से जूझते हुए नज़र आ रहे थे | वे छोटे-छोटे गड्ढे भी पूरी तरह सूखे पड़े थे जिनमें चिड़ियाँ और गिलहरियाँ पानी पीती थीं | सडक पर दौड़ते वाहनों के शोरगुल के बावजूद भी यहाँ बड़ा उदासी भरा सन्नाटा था | न चिडियाओं का ची-ची वाला वार्तालाप ने गिलहरियों की पकड़म-पकडाई | पास के खेत से कोई खरगोश भी प्यास बुझाने नहीं आया |
मेरा भी मन अब अपनी प्यास बुझाने का नही रहा था | मैंने अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की और चल पड़ा |
-जय कुमार