रेलगाड़ी छूटने में अभी कुछ समय बाकी था । एक बुज़ुर्ग भी मेरे पास आकर बैठ गये । थोड़ी देर बाद वो बोले " बेटा इतनी मोटी-मोटी किताबे कब तक गोद में लिए बठे रहोगे ? इन्हें ऊपर की बर्थ पर रख दो ।" मैंने सहज भाव से कहा कि किताबें ही तो हैं इनमें कैसा बोझ ?दरअसल किताबें तो मुझे दो और भी लेनी थी लेकिन जिस दुकानदार से मैंने ये पुस्तकें ली थी उसके पास वो थी नही और दूसरे वाला दस प्रतिशत से ज्यादा छूट देने को तैयार नही था । शिक्षण-शास्त्र की ये किताबें और किसी दुकान पर थी भी नही । सोच रहा था कि दोबारा शहर में आने से बेहतर था दस प्रतिशत पर ही शेष किताबें भी ले लेता ।
ट्रेन अभी भी नही चली थी । जिस तरफ मैं बैठा हुआ था वहाँ से कुछ खाली प्लेटफार्म दिखायी दे रहे थे । उनके पार वे प्लेटफार्म थे जो कभी अंग्रेजो के जमाने में इस्तेमाल होते थे । सहसा दृष्टि ठहरी । दूर से उन ज़र्जर प्लेटफार्म पर दो आकृतियाँ दिखायी दी । इस तरफ ही आ रही थी । दो लडकियाँ थी । एक दस- ग्यारह साल की, दूसरी उससे कुछ छोटी । पटरियों के बीच पत्थरों पर नंगे पैर । प्लास्टिक के खाली गिलास और पोलिथीन इक्कट्ठा कर रही थी । मैल की इतनी मोटी परत की त्वचा का रंग मुझे समझ नही आया । फटे हुए कपडे । कपडे क्या चीथड़े कहिये ।
एक झटके में बहुत सारी बातों ने मानो दिमाग पर हमला कर दिया- मुख्यमन्त्री महोदय के पिताजी के जन्म दिवस का महोत्सव , सर्व शिक्षा अभियान, सभी के लिए शिक्षा परियोजना, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, बेटी पढाओ बेटी बचाओ अभियान ,शिक्षा का अधिकार अधिनियम.. और भी बहुत कुछ .. लेकिन इन मासूम बच्चियों को क्या पता । मानव मल-मूत्र से सने पत्थरों के बीच पड़ी किसी पन्नी को देखकर इनके चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ जाती और उसे उठाकर इन्हें बहुत संतोष होता ।
दो समुदाय आपस में उन्माद में भिड जाते हैं और सरकार को मुआवजा देने के बहाने सरकारी खजाने को खाली करने का मौका मिल जाता है । मेयर शहर के सौन्दर्यीकरण पर लाखों करोड़ों खर्च करता है । धर्म की शिक्षा देने के लिए देश की धरती और सम्पत्ति को आश्रम और मदरसों में लगा दिया जाता है ।
किसी को ऐसी बच्चियाँ दिखायी नही देती ?
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बच्चियाँ अब काफी दूर निकल गयी थी । अब मुझे गोद में रखी किताबों में बोझ लगने लगा था । मुझसे अब इनका बोझ सहन नही हो रहा था । मैंने उन्हें ऊपर की बर्थ पर रखा ... और ट्रेन भी अब चल पड़ी ।
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- जय कुमार