कई साल पहले की बात है । मैं पास के एक कस्बे के एक बूथ का बूथ लेवल अधिकारी हुआ करता था । उसी सिलसिले में एक दिन एक घर के दरवाजे पर दस्तक दी । अतिथि कक्ष का दरवाजा खोला एक वयोवृद्ध व्यक्ति ने । मैंने अपनी बात शुरू भी नही की थी कि मेरे हाथ में अर्थशास्त्र की पुस्तक देख कर वो बोले - "अर्थशास्त्र में एम0ए0 कर रहे हो ?"
मैंने कहा- "जी हाँ , सरकारी सेवा में आने से पहले बी0एड0 और अंग्रेजी में एम0ए0 कर चुका हूँ ।"
इतना सुनते ही उन्होंने अंग्रेजी में बोलना शुरू कर दिया । उच्चारण पूर्णतया शुद्ध और शब्द चयन एकदम सटीक । उनके साथ अंग्रेजी में वार्ता करने में मुझे अब पसीने आने लगे थे ।"
वो बोले- " अंग्रेजी अच्छी जानते हो "
सुनकर मेरे अहम् की तुष्टि हुई । मैं तपाक से बोला कि फिर भी सरकार ने मुझे केवल छोटा सा शिक्षक बनाया । लहज़ा शिकायत भरा था ।
वो बोले -" अच्छा ये बताओ .. तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो । मैं अपने दिनों में क्या रहा हूँगा ?
उनका तेजस्वी चेहरा गौर से देखा । सारे बाल सफ़ेद यहाँ तक कि भौहैं और पलके भी । उनके कक्ष की सारी वस्तुओं और साज सज्जा को देखा । दोबारा फिर उन्हें देखा और उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करके मैं बोला -"आप अवश्य ही कोई राजपत्रित अधिकारी रहे होंगे ।"
इतना सुनते ही वो बहुत ज़ोर से हँसने लगे ।"
मुझे चकित देख उन्होनें बताया -"मैं राजपत्रित तो क्या किसी भी तरह का अधिकारी नही रहा । मेरे बच्चे ज़रूर राजपत्रित अधिकारी हैं । मैं हलवाई हुआ करता था।"
मेरे आश्चर्य की सीमा नही रही ।
उन्होंने मुझे पीने के लिए पानी दिया और पूछ कि क्या मैं जल्दी में हूँ । जब मैंने ना कहा तो वो फिर से मेरे सामने बैठ गए । इस बार वो बूढी आँखे काफी गम्भीर नज़र आई ।
उन्होंने फिर से अंग्रेजी में बोलना शुरू कर दिया -" भारत के बटवारे की खबर आग की तरह फ़ैल गयी थी । चारों तरफ से चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थी । फिर हमारे परिवार ने भी उस रात भारत से काट कर अलग कर दिए गए हिस्से को छोड़ने का फैसला कर लिया । रास्ते में हम पर जगह-जगह हमले हुए । औरतों की इज़्ज़त की हिफाज़त करते हुए पहले मेरे पिताजी मारे गए और फिर एक- एक करके तीनों भाई । और जब हमने पाकिस्तान को छोड़कर अवशेष भारत की ज़मीन पर पैर रखा तो हम अपना सब कुछ लुटा चके थे । बचे हुए परिवार में ज़िंदा बचा सबसे बड़ा पुरुष सदस्य 10 साल का था और वो मैं था । सुबह होने तक हम सब भारत की धरती से लिपटकर रोते रहे ।"
मैंने अपने आप को सँभालते हुए पुछा -"आप शरणार्थी थे । भारत सरकार ने शरणार्थियों की मदद की होगी ।"
उसी भाव में वो बोले -" मदद की भी हो तो मुझे पता नही । मैं अपनी तीनों विधवा भाभियों और उनके बच्चों को लेकर कई गाँव और शहरों में रहा। मज़दूरी की । एक अध्यापक की मदद से आठवीं की परीक्षा पास कर ली । बाद में एक डाकखाने में क्लर्क की नौकरी भी मिल गयी । लेकिन वेतन इतना कम था कि नौकरी छोड़कर मुझे हलवाई का काम शुरू करना पडा ।"
उदास मन से मैंने कहा -"कितना कुछ सहन किया होगा आपने । कभी दूसरे देश से आये शरणार्थी होने के कारण , कभी धर्म और जाति के कारण । यहॉं तो कोई आपका था ही नही । बहुत भेदभाव हुआ होगा आपके साथ । सरकारी मदद भी आपको नही मिली ।"
बूढी आँखों से छलकते आसुंओं को रोकते हुए वो फिर से बोले -"नही, हमें कभी ऐसा अहसास नही हुआ कि हमारे साथ किसी तरह का कोई भेदभाव हुआ हो । अपने परिवार को पालने के लिए मैंने यहाँ मज़दूरी की, नौकरी की, अपना खुद का भी काम किया और अब मेरे परिवार के कुछ लोग अच्छे व्यवसाय चला रहें हैं तो कुछ उच्च पदों पर सरकारी सेवा में । किसी ने हमें आगे बढ़ने से नही रोका ।
मैंने बोलना चाहा -"लेकिन सरकार और देश ने तो कुछ नही दिया ।"
कुछ उखड़ से गए वो -"कमाल करते हो । इस देश ने हमे साँस लेने के लिए हवा दी, रहने के लिए जगह दी, सुरक्षा दी और क्या चाहिए था हमें ? तुम जैसे नौजवान खुद तो कुछ करते नही सब कुछ देश तुम्हारे लिए करता रहे । तुम्हारी दुनिया भर की शिकायतें ... कभी धर्म को लेकर कभी जाति को लेकर। दुनिया भर की माँग ... कभी नौकरी माँगोगे कभी आरक्षण और कभी तरह-तरह की आज़ादी ।"
मैं कोई उत्तर नही दे पाया । उनका दृष्टिकोण जो समझ आ गया था । जब मैंने चलने की अनुमति माँगी तो उन्होंने मुझे रोका भी नही ।
पता नही अब वो ज़िन्दा भी हैं या नही लेकिन आज के परिदृश्य में उनकी बात मस्तिष्क से टकरा ही जाती हैं ।
- जय कुमार
मैंने कहा- "जी हाँ , सरकारी सेवा में आने से पहले बी0एड0 और अंग्रेजी में एम0ए0 कर चुका हूँ ।"
इतना सुनते ही उन्होंने अंग्रेजी में बोलना शुरू कर दिया । उच्चारण पूर्णतया शुद्ध और शब्द चयन एकदम सटीक । उनके साथ अंग्रेजी में वार्ता करने में मुझे अब पसीने आने लगे थे ।"
वो बोले- " अंग्रेजी अच्छी जानते हो "
सुनकर मेरे अहम् की तुष्टि हुई । मैं तपाक से बोला कि फिर भी सरकार ने मुझे केवल छोटा सा शिक्षक बनाया । लहज़ा शिकायत भरा था ।
वो बोले -" अच्छा ये बताओ .. तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो । मैं अपने दिनों में क्या रहा हूँगा ?
उनका तेजस्वी चेहरा गौर से देखा । सारे बाल सफ़ेद यहाँ तक कि भौहैं और पलके भी । उनके कक्ष की सारी वस्तुओं और साज सज्जा को देखा । दोबारा फिर उन्हें देखा और उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करके मैं बोला -"आप अवश्य ही कोई राजपत्रित अधिकारी रहे होंगे ।"
इतना सुनते ही वो बहुत ज़ोर से हँसने लगे ।"
मुझे चकित देख उन्होनें बताया -"मैं राजपत्रित तो क्या किसी भी तरह का अधिकारी नही रहा । मेरे बच्चे ज़रूर राजपत्रित अधिकारी हैं । मैं हलवाई हुआ करता था।"
मेरे आश्चर्य की सीमा नही रही ।
उन्होंने मुझे पीने के लिए पानी दिया और पूछ कि क्या मैं जल्दी में हूँ । जब मैंने ना कहा तो वो फिर से मेरे सामने बैठ गए । इस बार वो बूढी आँखे काफी गम्भीर नज़र आई ।
उन्होंने फिर से अंग्रेजी में बोलना शुरू कर दिया -" भारत के बटवारे की खबर आग की तरह फ़ैल गयी थी । चारों तरफ से चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थी । फिर हमारे परिवार ने भी उस रात भारत से काट कर अलग कर दिए गए हिस्से को छोड़ने का फैसला कर लिया । रास्ते में हम पर जगह-जगह हमले हुए । औरतों की इज़्ज़त की हिफाज़त करते हुए पहले मेरे पिताजी मारे गए और फिर एक- एक करके तीनों भाई । और जब हमने पाकिस्तान को छोड़कर अवशेष भारत की ज़मीन पर पैर रखा तो हम अपना सब कुछ लुटा चके थे । बचे हुए परिवार में ज़िंदा बचा सबसे बड़ा पुरुष सदस्य 10 साल का था और वो मैं था । सुबह होने तक हम सब भारत की धरती से लिपटकर रोते रहे ।"
मैंने अपने आप को सँभालते हुए पुछा -"आप शरणार्थी थे । भारत सरकार ने शरणार्थियों की मदद की होगी ।"
उसी भाव में वो बोले -" मदद की भी हो तो मुझे पता नही । मैं अपनी तीनों विधवा भाभियों और उनके बच्चों को लेकर कई गाँव और शहरों में रहा। मज़दूरी की । एक अध्यापक की मदद से आठवीं की परीक्षा पास कर ली । बाद में एक डाकखाने में क्लर्क की नौकरी भी मिल गयी । लेकिन वेतन इतना कम था कि नौकरी छोड़कर मुझे हलवाई का काम शुरू करना पडा ।"
उदास मन से मैंने कहा -"कितना कुछ सहन किया होगा आपने । कभी दूसरे देश से आये शरणार्थी होने के कारण , कभी धर्म और जाति के कारण । यहॉं तो कोई आपका था ही नही । बहुत भेदभाव हुआ होगा आपके साथ । सरकारी मदद भी आपको नही मिली ।"
बूढी आँखों से छलकते आसुंओं को रोकते हुए वो फिर से बोले -"नही, हमें कभी ऐसा अहसास नही हुआ कि हमारे साथ किसी तरह का कोई भेदभाव हुआ हो । अपने परिवार को पालने के लिए मैंने यहाँ मज़दूरी की, नौकरी की, अपना खुद का भी काम किया और अब मेरे परिवार के कुछ लोग अच्छे व्यवसाय चला रहें हैं तो कुछ उच्च पदों पर सरकारी सेवा में । किसी ने हमें आगे बढ़ने से नही रोका ।
मैंने बोलना चाहा -"लेकिन सरकार और देश ने तो कुछ नही दिया ।"
कुछ उखड़ से गए वो -"कमाल करते हो । इस देश ने हमे साँस लेने के लिए हवा दी, रहने के लिए जगह दी, सुरक्षा दी और क्या चाहिए था हमें ? तुम जैसे नौजवान खुद तो कुछ करते नही सब कुछ देश तुम्हारे लिए करता रहे । तुम्हारी दुनिया भर की शिकायतें ... कभी धर्म को लेकर कभी जाति को लेकर। दुनिया भर की माँग ... कभी नौकरी माँगोगे कभी आरक्षण और कभी तरह-तरह की आज़ादी ।"
मैं कोई उत्तर नही दे पाया । उनका दृष्टिकोण जो समझ आ गया था । जब मैंने चलने की अनुमति माँगी तो उन्होंने मुझे रोका भी नही ।
पता नही अब वो ज़िन्दा भी हैं या नही लेकिन आज के परिदृश्य में उनकी बात मस्तिष्क से टकरा ही जाती हैं ।
- जय कुमार