बारिश थम चुकी थी । दूर से सब्जी बेचने वाले की आवाज़ आ रही थी । कुछ मिनटों बाद जब अपने घर के पास फिर उसकी आवाज़ सुनायी दी तो धर्मपत्नी ने आदेश दिया -"अब इस फ़ोन को रख दो और जाकर सब्ज़ी ले आओ । वैसे भी ऐसे मौसम में सब्जी वाले आते ही कहाँ हैं ।" गुरुपूर्णिमा के दिन भी ऐसे बेरहम आदेश ?? खैर, बाहर आया तो देखा कि सब्ज़ी विक्रेता एक किशोर था । पुराने मैले कपड़े पहने हुए था जो पूरी तरह भीग गए थे । देखने मे बहुत दरिद्र लग रहा था । मैंने ज़रूरत के हिसाब से सब्जियाँ ले ली । लेकिन यह क्या वह तो पैसे लेने को तैयार ही नही हो रहा था । बोला-"आप मेरे गुरु हैं , पैसे कैसे ले लूँ ? मैंने पूछा -"मैं तो तुम्हे जानता भी नही तो गुरु कैसे हुआ ?" जब उसने विस्तार से बताया तो मुझे याद आ गया कि यह किशोर कुछ दिनों के लिए उस सरकारी स्कूल में पढ़ने आया था जहाँ कभी मैं नियुक्त था । ज़्यादा दिनों तक वह स्कूल में रहा नही था इसलिए मुझे वह याद नही था । वो अगर पढ़ने में होशियार होता तो शायद याद रह भी जाता ।
मेरे बार-बार कहने पर भी वह पैसे लेने को तैयार नही हुआ । अन्त में जब मैंने सब्जियाँ वापस रख दी तो बोला -"अच्छा अगली बार पैसे जरूर ले लूँगा । इस बार तो आप पैसे देने की ज़िद न करें , मेरा मान रखने के लिए ही सही ।" उस समय अनायास ही उन तथाकथित कामयाब शिष्यों की याद आ गयी जिन्हें मैं वर्षों तक अपने घर पर मामूली सी फीस लेकर या बिना फीस के घण्टों-घण्टों तक पढ़ाया करता था । जो अब निजी, सार्वजनिक या सरकारी संस्थाओं में ऊँचे वेतनों पर काम कर रहे हैं । ये शिष्यगण कभी कहीं मिल भी जातें हैं तो सामान्य अभिवादन तक नही करते । शायद छत पर पहुँच कर अब सीढ़ी इन्हें तुच्छ लगने लगी है ।
तभी एक कार के हॉर्न ने तन्द्रा को भंग किया । हॉर्न के संकेत मुझे रास्ते से हटने के लिए कह रहे थे । कार पास से गुजरी तो देखा चालक सीट पर जो युवक बैठा था वो भी कभी मेरे पास पढ़ने आया करता था । कार आगे बढ़ी तो कार के पीछे वाले पहिये कीचड़ के गड्ढे में ज़ोर से पड़े । कीचड़ के छींटें मेरे चेहरे तक आये ।
सब्ज़ी लेकर घर मे प्रवेश करते समय यही सोच रहा था कि क्या सच में ये सब्ज़ी वाला ही दरिद्र है या फिर वे तथाकथित कामयाब शिष्यगण या फिर कहीं स्वयं मैं ही तो नही जो अपनी शिक्षा के बदले अभिवादन पाने की अपेक्षा रखता है ।
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- जय कुमार